Thursday, 29 December 2016

Chhattisgarhi kavita ? जिनगी म उखरे प्यार होही ? सिक्का जिहा बौछार होही

जिनगी म उकेरे पियार होही।
सिक्का के जीहां बौछार होही।

धन बर बनही सबो रिस्ता नाता,
मया के डोरी तार तार होही।

दू कौड़ी मा ईमान बेचाही ,
ये दुनिया ह सिरतोन बजार होही।

लबरा मन के दिन ह बहुरही,
सतवन्ता के ऊजार होही।

पइसा के बाढ़ही कतका ताकत
मनखे ह कतका अउ लाचार होही।

जनता लुटाही संझा बिहिनिया,
बैपारी मनके जब सरकार होही।

अब कौन बचाही काकर धन ल,
चोर मन जिहां पहरेदार होही।

कतको बरजबे कोनो नई माने,
परसान' जिनगी तोरे खराब होही।
***********************
**************************

झूठ लबारी मार झन।
भूल ककरो उपकार झन।

गरीब के सिरतोन आह लग जाथे।
छानही ककरो ओदार झन।

तीर तार के डूबकैया आस ,
भरे तरिया के पार झन।

हिरदय के मोर हाल पूछ के,
जरे म अउ नून डार झन।

बोर दे चाहे पार लगा,
गठबंधन सरकार झन।

तरी तरी मसकत मलाई,
दीया ल अभी बार झन।

रखवार हे गोल्लर ह इहाँ के,
रइचर ल अभी तार झन।

परसाद जे कोनो सरन म आवे,
कभू ओला दुत्कार झन।

No comments:

Post a Comment